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अमावस की रात में

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प्रीत के सुर में गुनगुनाये  , तुम अमावस की रात में, फूल जैसे खिलखिलाये,तुम खुशबुओं की बरसात में, अमरबेल-सा अपना प्यार, अमर रहेगा सदियों तलक, दीपक जैसे जगमगाये , तुम मन-आँगन-बारात में । ----  निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी "नीरू"

धरती का उल्लास

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बंद क्यों भ्रमर राग है,सारिका भी उदास| कहो तो कब कहाँ गया,धरती का उल्लास| सुखद पल नवल भोर का,विश्वास अटल रहे, धीरज संयम नियम का ,करना बस अभ्यास| निरुपमा मिश्रा 'नीरू' आप सभी को नव संवत्सर एवं चैत्र नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें....

अब मिले आप

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अब मिले आप भी, ज़िंदगी की तरह रोशनी मिल गयी, बंदगी की तरह हम नहीं बेख़बर, आपसे अब रहे आप हैं अब हमारी,ख़ुशी की तरह ---- नीरु

रंग अपने बचपन के

रंग बदलती हुई दुनिया में, रंग अपने बचपन के उम्र भले ही कितनी होगी, दिल दो रहने बचपन से दुनियादारी के चक्कर में, ख़ुद को भी हम भूल गये हमसे हमको मिलवाये, वो ढंग सलोने बचपन के ---- नीर...

हवाओं की खुशबू में है

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जिसे खोजती रहीं निगाहें वो मेरे पहलू में है आईना वही तो दिल का जो मेरी आरजू में है मुस्कराने लगी ये कायनात देख अदायें उसकी वो तो गुलशन की झूमती हवाओं की खुशबू में है ------ नीरु

होली

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चहक उठी है सृष्टि सलोनी मोहक सिर पर ताज़ महकती हवा के पंख लगाकर मन तो झूमें आज आज देखकर  मनमोहन को  ये नयन शरमाये मन के द्वार पर मुस्काये सजना बावरे आज ----- निरुपमा मिश्रा

गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें

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फिर उजाले से हमें धोखा हुआ है क्यों भला साँप जैसे कौन ये लिपटा हुआ है क्यों भला गोद सूनी,माँग सूनी , बुझ गया रोशन दिया चल रही सरहदों पर बेरहम ये हवा है क्यों भला ------ निरुपमा मिश्...

किससे कहें

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सह रहे हम चुपचाप क्यों, बयान किससे कहें क्यों खोया सुकून, जिस्म बेजान किससे कहें दहशतों-नफ़रतों का आखिरी अंजाम दर्द यहाँ  इंसान हो रहा हैवान किससे कहें  ---- नीरु (निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी)

तितली के रंग

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बचपन की प्यारी ताज़गी का ढंग  अभी बाकी है लम्हों में  उनके जिंदगी का संग  अभी बाकी है खो न जाये कहीं बचपन-सुकून-सपनों के बगीचे नन्ही हथेली में तितली का   रंग अभी बाकी है ----- निरुपमा मिश्रा

रोशनी का त्योहार

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रोशनी होती दिलों में हमेशा प्यार से मिटायें  हर ग़म का अंधेरा संसार से  बेबसी के आँसू हों नही किसी आँख में सीखते हम यही रोशनी के त्योहार से ----- निरुपमा मिश्रा

कलियाँ

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खुशबुओं से भिगोने अपने चमन को कलियाँ छोड़कर जाती ये अपने बाबुल की गलियाँ धान के पौधे सा कोमल है इनका वजूद छलावों की धूप में स्वार्थ बरसाये दुनियाँ ----- निरुपमा मिश्रा

चेहरे

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नकाबों में छुपे हैं चेहरे कितने झूठे थे ख्वाब जो, वो सुनहरे कितने निगाहें भी निगेहबां भी हमारे वो दिखाये अक्स जो, वो दोहरे कितने ----  नीरु ( निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी)

देश

देश के लिए भी तो मशविरा करिये कुर्बान अपनी जिस्म-ओ-जां करिये अंधेरा न हो रास्तों पर कभी भी हो सके तो चिराग़ -सा जला करिये ---- निरुपमा मिश्रा " नीरू"

मित्रता

प्यार,स्नेह,ममता का भला कोई क्या मोल दूँ मैं शब्दों से ऊपर जो, उसे कोई क्या बोल दूँ मैं रिश्तों में दोस्ती है तो कायम दोस्ती से रिश्ते साँसें हैं जिनसे,नाम कोई क्या अनमोल दूँ ...

कृतज्ञ राष्ट्र की भावभीनी श्रृद्धांजलि,, सलाम हमारा आदरणीय कलाम जी को

गर्व उन्नत भाल के थे सम्मान, विजय-तिलक सरीखे राष्ट्र-नयनों ने उनके संग निज स्वप्न हैं सफल देखे शिक्षक थे हिंदुस्तानी, तो शिक्षक समान ही विदा हुए ज्ञान,विज्ञान,स्वाभिमान का आजीवन संगम अनूठे ------ नीरु 

थाह

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कौन है अपना कौन पराया थाह मिलेगी कहाँ जो सरल है उसे सहजता से राह मिलेगी कहाँ जब तक न पहचानेंगे नयन रंग इस संसार के सपन को साकार करने की सलाह मिलेगी कहाँ ----- निरुपमा मिश्रा " नीरू "

मौत

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ठहरे दर्द को लेकर तो हर पल पुकारा होगा तिल-तिल मर रही इंसानियत को धिक्कारा होगा जिंदगी तकलीफ देती रही उसे अंतिम साँस तक मौत ने भी आखिर खामोशी से मारा होगा ----- निरुपमा मिश्रा "न...

चाह

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अपनेपन की चाह अपने रिश्तों में रही दिल की बात दिल से हमने किश्तों में कही भावना की चाह है नही बात कमियों की हम भी तो इंसानों में फरिश्तों में नही ---- निरुपमा मिश्रा " नीरू "

दर्द

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सिहर-सहम उठता ये ज़माना हर आँख रोई जिंदगी ने जब- जब भी अर्थी मौत की ढोई कहीं टूटे सपनें किसी के छूट गये अपने पाया इस दर्द को जिसने कब भूलता कोई --- निरुपमा मिश्रा " नीरू "

जीवन की बगिया

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मैं सुखों की शाम बनूं तू आशाओं की भोर बने मैं रहूँ तेरी प्राणप्रिया तू साँसों की डोर बने जीवन की बगिया मेरी तुम्हीं संवारना सजन प्यासी धरती जैसी मैं हूँ तू घटा घनघोर बने ---- नीरु ( निरुपमा मििश्रा त्रिवेदी )