विद्यादायिनी
नही भ्रमवश तितिक्षायें, उपासना नित ज्ञान विस्मृत लोभ - लिप्सायें, आराधन का ध्यान आराधन का ध्यान , निशिदिन विद्यादायिनी उल्लासित मन सदा, प्रखर बुद्धि सुखदायिनी रत क्यों छ...
मन के बोल पर जब जिंदगी गहरे भाव संजोती है, विह्वल होकर लेखनी कहीं कोई संवेदना पिरोती है, तुम भी आ जाना इसी गुलशन में खुशियों को सजाना है मुझे, अभी तो अपनेआप को तुझमें पाना है मुझे