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मन की पीड़ा झुठलाई

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 दिवंगत पूज्यनीय पिता जी को अश्रुपूरित श्रृद्धांजलि....🙏 मोहक सरल छवि आपकी सागर सी गहराई। व्यक्तित्व गगन के जैसा धरती सम करुणा पाई। साहस का पर्याय आप थे संघर्षों से भरा था जीवन, ममता की मूरत थे हरदम निर्मल निश्छल था अंतर्मन, मधुर बोल की औषधि से मन की पीड़ा झुठलाई। पथ प्रदर्शक आशा ज्योति जीवन भर ही कर्म रहा, सुख दुख में समदर्शी थे परोपकारी मर्म रहा, जीवन अनमोल धरोहर बात हमेशा सिखलाई। सखा पिता बेटा भाई पति रूप अनूप आपके, सदगुणों के महासागर उत्तम इंसान आप थे, धन्य भाग्य मेरे मै जो सुता आपकी कहलाई। निरुपमा मिश्रा 'नीरू''

दवा दिल की पीर के

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जो चल पड़ेंगे अंधेरों को चीर के दवायें  बनेंगे वही  दिल की पीर के हैं भूलनी पीड़ा तो सब प्रथायें सड़ी -गली  अब बनेंगी जिंदगी की परिभाषायें नई -नई होंगे नही  फकीर हम किसी लकीर के जो चल ----- वही बनेंगे------ खुशी टूटे दिल की , मिली नज़र को रोशनी गुमसुम खोयेगी  कब चार दिन की चाँदनी  बनकर  ग़ज़ल-गीत रहना है नज़ीर  के जो चल------- वही बनेंगे------ हो जाये  कितना भी कद ये खजूर तो नही  आँसू किसी आँख में हमें मंजूर तो नही  छाया  भी मिले नही क्यों  राहगीर के  जो चल पड़ेंगे अंधेरों को चीर के  दवायें वही बनेंगे दिल की पीर के  ------- नीरु

तुम्ही रहते हो हर पल सपनीली निगाहों में

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तुम्ही रहते हर पल सपनीली निगाहों में रहना साथ जीवन की पथरीली राहों में कभी तो अक्स उभर आता  कभी ओझल हो जाते हो , कभी सांसों के करीब कभी बीते पल हो जाते हो  तुम्ही तो बसते  हो मेरी कल्पनाओं में  रहना साथ जीवन की पथरीली राहों में तुम वही हूबहू जिसको दिल मेरा मोहब्बत कहता तुम्हारी आरजू में ही दिल मेरा धड़कता रहता तुम्ही तो हरदम मेरे प्यार की चाहों में रहना साथ जीवन की पथरीली राहों में मायूसियों में कभी मुझे तुम मिटने नही देते किसी भी ग़म में कभी बेबस उलझनें नही देते  जाने नही देते निराशा की पनाहों में  रहना साथ जीवन की पथरीली  राहों में  प्यार- भरोसा ही तो सभी रिश्तों का सहारा है सपनों से सजा हुआ सुंदर संसार हमारा है  डूबने पाये नही कश्ती कभी आहों में  रहना साथ जीवन की पथरीली राहों में चाँद की गवाही में अपने प्यार की रोशनी होगी महफिल में सितारों की महकी- महकी चाँदनी होगी  खुशबुओं के रंग बिखर जायेंगे राहों में रहना साथ जीवन की पथरीली राहों में तुम्हीं रहते हर पल सपनीली निगाहों में रहना साथ जीवन की पथर...

खोल दे मन के द्वार

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मुस्कान तेरी चंपई रूप तेरा हरसिंगार अब खोल दे मन के द्वार   तन है थामें सांस जब तक रहे शक्ति-आभास तब तक   स्वयं तुम नदिया की धार अब खोल दे मन के द्वार लता पनपे तुमसे प्यार की बगिया हो ममता-दुलार की शक्ति का तुम ही उपहार खोल दे अब मन के द्वार भावनायें जब होती मनोहर हो जाता जीवन सुमन- सरोवर महक जाता है संसार खोल दे अब मन के द्वार -----  नीरु 'निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी'

शीतल छाँव तुम

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जलते-तपते हुए जीवन में शीतल- मधुर छाँव हो तुम पलकों की पगडंडियों पर तो सपनों के गाँव हो तुम मैं सुखों की शाम बनी तुम आशाओं की भोर हुए मैं प्यासी धरती जैसी  तुम तो घटा घनघोर हुए मिल जाती चाहत को मंजिल मेरे वो लगाव हो तुम  जलते-तपते हुए जीवन... पलकों की पगडंडियों....  विह्वल- विभोर होकर जब तुमने पुकारा है मुझको अनुभूतियों ने दिल की तो फिर संवारा है मुझको उबारे उलझन से मुझे विश्वास की वो नाँव हो तुम जलते-तपते हुए जीवन.... पलकों की पगडंडियों... अतृप्त मन-जीवन है तो कभी मधुमास दिया कभी सराहे जगत यूं तो कभी परिहास किया नही पराजय कोई जग- शतरंज में वो दाँव हो तुम जलते-तपते हुए जीवन में शीतल- मधुर छाँव हो तुम पलकों की पगडंडियों पर तो सपनों के गाँव हो तुम ---- नीरु 'निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी'

ख्वाबों में बुला लेना मुझे

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याद आये अगर ख्वाबों में बुला लेना मुझे खुशबू जैसी हूँ साँसों में बसा लेना मुझे रहे चाहत जब भी कुछ गुनगुनाने की रहे हसरत जब भी सब भूल जाने की गीत  के आँगन में सुरों से सजा लेना ...

फागुन

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धरती ने ओढी, चुनरिया प्रीत की। चलती हूँ मैं भी, डगरिया  मीत की।। मन के द्वारे रंग, फागुन भरने आये, लाज की देहरी भी, पाहुन लांघ जाये, देखूँ अब मैं भी, नजरिया रीत  की।। अब सभी यातनायें, जग की विस्मृत हुई , अब सभी कामनायें, प्रिय की अमृत हुई , रहती मन में , लहरिया संगीत की।। रंग रंगाऊं, प्रियतम-सुमन की लगन में, जग भूल जाऊँ , प्रेम-प्रियतम की जतन में, धुन सजाऊँगी, संवरिया गीत की।। चलती हूँ मैं भी, डगरिया मीत की।। --- नीरु ( निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी(

जीवन का विश्वास

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धरती ने नित परहित विकसित किये नवांकुर है परहित जीवन जियें सार्थक वरन क्षणभंगुर है मलयज के संग-संग चले अगर जीवन की श्वांस बने, कलकल करती नदियों के संग जीवन का विश्वास बने, सृ...

सत्य से भ्रमित नयन क्यों ?

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सत्य  से भ्रमित नयन क्यों ? लक्ष्य से थकित चरण क्यों ? साथ हों हृदय की संवेदनायें, भाव में प्रणव की आराधनायें, दर्प से दमित वदन क्यों ? सत्य से भ्रमित नयन क्यों ? क्यों हुआ विचलि...