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कालिख सभ्य समाज पर

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बस्ती में खामोशियां, थी सड़कें भी  मौन। बेबस के चीत्कार को, कब सुनता है कौन।। कोई  घटना  यूं  नही,  होती आकस्मात । घटनाओं की भूमिका,लिखता भीतरघात।। लज्जित मानवता हुई, नरपशु को धिक्कार। कालिख सभ्य समाज पर, पाशविक अनाचार।। शोर हुआ हलचल हुई,उभरा दर्द अपार। जन मन को आघात दे,हिंसा अत्याचार ।। कुछ मिनटों के मौन पर, ठहर गया है वक्त। अपराधी को चाहिए, दंड सख्त से सख्त।।

सतरंगी प्रीत

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प्रमुदित मन संचित करे,हरदम ही उल्लास। रंग सदैव उमंग का, जीवन में मधुमास।१। भाव भावना भेद को, नेक लगायें रंग। अमिट रहेगा उम्र भर, सहज नेह का ढंग।२। नयन झुकाये लाज से, अधर सजी मुस्कान। प्रिय के रंग में रंगी,सजनी एक सुजान।३। तन मन पर यूँ छा गया, रंग गुलाल अबीर। लोकलाज सब भूल कर, अंतस हुआ अधीर।४। रंग एक हो मीत का, सतरंगी हो प्रीत। विश्वास अटल प्रेम का, मन को लेता जीत।५। होली की शुभकामना, करिये मीत कबूल। ईर्ष्या द्वेष अतीत के, दर्द हृदय के भूल।६। बचें केमिकल रंग से, कर देते बीमार। प्राकृतिक रंग ही सदा,खुशियों का उपहार।७। निरुपमा मिश्रा 'नीरू'

बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें

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भावना सरल प्रीत की,करुणा, विवेक, ज्ञान सृष्टि सुंदरता निखरे, जीवन हो आसान --- निरुपमा मिश्रा