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Showing posts with the label धार्मिक लेख

दीपावली पर्व 2025....मां लक्ष्मी एवं श्री गणेश जी के पूजन के साथ ही पितृदोष से मुक्ति के उपाय जानिए....।

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दीपावली का त्योहार अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। इस दिन कुछ विशेष कार्य करके आप पितृदोष दूर कर सकते हैं और पितरों का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। आज हम आपको इसी के बारे में जानकारी देंगे। दीपावली का त्योहार हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। इस दौरान लक्ष्मी पूजन, गणेश पूजन से तो लाभ मिलता ही है साथ ही कुछ विशेष कार्य करके इस दिन आप पितरों का आशीर्वाद भी प्राप्त कर सकते हैं। दिवाली अमावस्या के दिन मनाई जाती है और अमावस्या को पितरों को समर्पित तिथि के रूप में भी देखा जाता है। ऐसे में आइए जान लेते हैं कि पितरों को प्रसन्न करने के लिए आपको कार्तिक अमावस्या या दिवाली के दिन क्या-क्या काम करने चाहिए ? गंगा किनारे या पीपल तले करें ये उपाय अगर आपके जीवन में परेशानियां चली आ रही हैं, बनते काम बिगड़ते हैं, तो इसका कारण पितृदोष हो सकता है। इसे दूर करने के लिए दिवाली की शाम आपको गंगा नदी के किनारे या फिर किसी पीपल के पेड़ तले 16 दीपक पितरों को याद करते हुए जलाने चाहिए। ऐसा माना जाता है कि, यह उपाय करने से पितरों की आत्मा तृप्त होती है। उनको शांति मि...

रावण कौन ❓️

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रावण कौन ?  बाल्मीकि रामायण में रावण का चरित्र एवं घटनाक्रमों का एक गूढ़ अध्यात्मिक रहस्य भी है, जिसमें रावण के इस राक्षस स्वरूप का वर्णन नही किया गया है।  रावण त्रेता युग का एक विशिष्ट ऐतिहासिक व्यक्तित्व रहा है वह रक्ष संस्कृति के रक्ष धर्म का पुनउद्धारक एवं प्रवर्तक रहा है, रक्षसंस्कृति के इतिहास और संस्कृति से रावण के संबंध के बारे में जानना आवश्यक है।  उस काल में विश्व में दो संस्कृतियाँ मुख्य रूप से विकसित हो रही थी इनमें से एक वैदिक संस्कृति थी दूसरी संभू संस्कृति थी वैदिक संस्कृति आक्रमणकारी संस्कृति थी (आर्यसंस्कृति) और वह सपाट मैदानों की संस्कृति थी जो नदियों के तटों पर विकसित हो रही थी यह कृषि प्रधान संस्कृति थी, जिस में पशुपालन,  गृह उद्योग का व्यवसाय होता था।  इनमें व्यवस्थित पारिवारिक सामाजिक ढांचा था और इसका प्रसार दूर-दूर तक था इनके पास उन्नत किस्म का विज्ञान था जो इस प्रकृति के उर्जा जगत से संबंधित था। इनके कुल नायक इन्द्र व उपेन्द्र (विष्णु) थे।  जिसका संबंध इनके यज्ञविधान से था। जिसे यह ब्रह्मविद्या कहते थे इनके विवरण अत्यंत ग...

देवी भागवत पुराण... संक्षिप्त विवरण।

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देवी भागवत पुराण  देवी भागवत पुराण हिंदू धर्म की भक्ति  के अंतर्गत जिसे शाक्तवाद कहा जाता है , का एक ग्रंथ है, जिसमें महान देवी की पूजा प्राथमिक रूप से की जाती है। देवी भागवत पुराण को सामान्यतः 18 "लघु" या संप्रदायगत पुराणों ( विश्वकोश संग्रह जिनके विषय ब्रह्मांड विज्ञान और ब्रह्माण्ड विज्ञान से लेकर देवताओं की पूजा के लिए अनुष्ठान निर्देशों तक विस्तृत हैं ) में सूचीबद्ध किया गया है। इसकी रचना की तिथि अज्ञात है; विद्वानों ने इसे छठी शताब्दी ईस्वी से लेकर 14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक का माना है। संभवतः इसकी रचना बंगाल में, संभवतः एक निश्चित समयावधि में, स्थानीय संप्रदाय के सदस्यों द्वारा की गई थी, जिनकी भक्ति देवी पर केंद्रित थी। यह ग्रंथ 12 खंडों और 318 अध्यायों में विभाजित है। यह (अन्य पुराणों की तरह ) ब्रह्मांड की रचना के वृत्तांत से आरंभ होता है—यहाँ इस कृत्य का श्रेय देवी को दिया गया है, जो स्वयं को तीन शक्तियों , या ब्रह्मांडीय शक्तियों के रूप में प्रकट कर...

ब्रह्माण्ड और जीवन की अनंत यात्रा...।

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ब्रह्माण्ड और जीवन की अनंत यात्रा...।  क्या आपने कभी सोचा है कि आप कौन है ? आपका यह शरीर कहां से आया है ? आपके चेहरे की पहचान आप के स्वभाव की गहराई यह सब कहां से आया ? आप सिर्फ कुछ साल पहले जन्मे एक इंसान है तो क्या आप भी करोड़ों साल पुरानी एक यात्रा का हिस्सा है ? हम सोचते हैं कि इंसान जन्म लेता है ज्ञान कहता है कि हम में से कोई भी वास्तव में मरता नही.. कल्पना कीजिए आज आपका खून आपकी नसों में जो बह रहा है वह लाखों करोड़ों साल पुराना है। हमारी हर कोशिका में एक अमर कहानी लिखी हुई है, आप अपने अंदर अपने पूर्वजों की आवाज लिए बैठे हैं आपकी आंखें, आपका चेहरा, आपकी आदतें सब कुछ एक लंबी श्रृंखला का हिस्सा है हजारों साल पहले आपके पूर्वजों की जिन्दगी का हिस्सा है और यह सब कल आपकी आने वाली संतान में जाएगा।  आपकी उपस्थिति, आपके अनुभव, आपकी ताकत पीढ़ियों में चलते रहेंगे और आध्यात्मिक दृष्टि के अनुसार आत्मा न जन्म लेती है न मरती है।  आज का आधुनिक विज्ञान भी यही कहता है कि ऊर्जा कभी खत्म नहीं होती है यानि कि अध्यात्म और विज्ञान दोनों एक ही सत्य की ओर इशारा कर रहे हैं दोनों मि...

काशी ( बनारस/ वाराणसी) में गुप्त रहस्य 64 (चौसठ/ चतुष्ट / चौसष्ट्टी ) योगिनी तीर्थ-यात्रा....।

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⭐ काशी में गुप्त रहस्य ६४ चौसठ/ चतुष्ट / चौसष्ट्टी योगिनी तीर्थ-यात्रा 🔱  ➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖  समस्त पृथ्वी में सर्वतीर्थों की राजधानी काशी में गुप्त व गूढ़ -रहस्यों से भरी हुई, तीर्थ-यात्रा के बारे में दुर्लभ शास्त्रों,पुराणों, ग्रंथों,वेदों में वर्णित व प्रमाणित गुढ़-रहस्यो को आप भी जानिए....। कृष्णपक्षस्य भूतायामुपवासी नरोत्तमः। तत्र जागरणं कृत्वा महतीं सिद्धिमाप्नुयात् ।।४९।। प्रणवादिचतुर्थ्यन्तैर्नामभिर्भ क्तिमान्नरः। प्रत्येकं हवनं कृत्वा शतमष्टोत्तरं निशि।।५०।। संसर्पिषा गुग्गुलुना लघुकोलप्रमाणतः । यां यां सिद्धिमभीप्सेत तां तां प्राप्नोति मानवः ।।५१ ।। नामानीमानि यो मर्त्यञ्चतुःषष्टिं दिने दिने । जपेत त्रिसंध्यं तस्येह दुष्टबाधा प्रशाम्यति ।।४२ ।। न डाकिन्यो न शाकिन्यो न कूष्मांडा न राक्षसाः । तस्य पीडां प्रकुर्वन्ति नामानीमानि यः पठेत् ।।४३ ।। शिशूनां शांतिकारीणि गर्भशांतिकराणि च । रणे राजकुले वापि विवादे जयदान्यपि ।।४४ ।। लभेदभीप्सितां सिद्धिं योगिनीपीठ सेवकः । मन्त्रान्तरारायेपि जपंस्तत्पीठे सिद्धिभाग् भवेत् ।।४५ ।। बलिपूजोपहारैश्च धूपदीपसमर्पणैः । क्षिप्रं प्रस...

दैवीय शक्ति से साक्षात्कार कराते मंत्र...।

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दैवीय शक्ति से साक्षात्कार कराते मंत्र ======================== मंत्रों का प्रयोग मानव ने अपने कल्याण के साथ-साथ दैनिक जीवन की संपूर्ण समस्याओं के समाधान हेतु यथासमय किया है और उसमें सफलता भी पाई है, परंतु आज के भौतिकवादी युग में यह विधा मात्र कुछ ही व्यक्तियों के प्रयोग की वस्तु बनकर रह गई है। मंत्रों में छुपी अलौकिक शक्ति का प्रयोग कर जीवन को सफल एवं सार्थक बनाया जा सकता है। सबसे पहले प्रश्न यह उठता है कि 'मंत्र' क्या है, इसे कैसे परिभाषित किया जा सकता है। इस संदर्भ में यह कहना उचित होगा कि मंत्र का वास्तविक अर्थ असीमित है। किसी देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए प्रयुक्त शब्द समूह मंत्र कहलाता है।  जो शब्द जिस देवता या शक्ति को प्रकट करता है उसे उस देवता या शक्ति का मंत्र कहते हैं। मंत्र एक ऐसी गुप्त ऊर्जा है, जिसे हम जागृत कर इस अखिल ब्रह्मांड में पहले से ही उपस्थित इसी प्रकार की ऊर्जा से एकात्म कर उस ऊर्जा के लिए देवता (शक्ति) से सीधा साक्षात्कार कर सकते हैं। ऊर्जा अविनाशिता के नियमानुसार ऊर्जा कभी भी नष्ट नहीं होती है, वरन्‌ एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती रहती है। ...

नौ औषधियों के पेड़-पौधे जिन्हें नवदुर्गा कहा गया है.... आइये जानते हैं कि वे कौन से हैं ❓️

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नौ औषधियों के पेड़- पौधे जिन्हें नवदुर्गा कहा गया है.... आइये जानते हैं कि वे कौन से हैं ❓️ (1) शैलपुत्री (हरड़) कई प्रकार के रोगों में काम आने वाली औषधि हरड़ हिमावती है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप है.यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है यह पथया, हरीतिका, अमृता, हेमवती, कायस्थ, चेतकी और श्रेयसी सात प्रकार की होती है। (2) ब्रह्मचारिणी (ब्राह्मी) ब्राह्मी आयु व याददाश्त बढ़ाकर, रक्तविकारों को दूर कर स्वर को मधुर बनाती है.इसलिए इसे सरस्वती भी कहा जाता है। (3) चंद्रघंटा (चंदुसूर) यह एक ऎसा पौधा है जो धनिए के समान है. यह औषधि मोटापा दूर करने में लाभप्रद है इसलिए इसे चर्महंती भी कहते हैं। (4) कूष्मांडा (पेठा) इस औषधि से पेठा मिठाई बनती है.इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं. इसे कुम्हड़ा भी कहते हैं जो रक्त विकार दूर कर पेट को साफ करने में सहायक है मानसिक रोगों में यह अमृत समान है। (5) स्कंदमाता (अलसी) देवी स्कंदमाता औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं. यह वात, पित्त व कफ रोगों की नाशक औषधि है.इसमे फाइबर की मात्रा ज्यादा होने से इसे सभी को भोजन के पश्चात काले नमक सेभूंजकर प्रतिदिन सुबह श...

क्या आपने देखा है बाराबंकी का ये रहस्यमयी जल कुंड...?

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बाराबंकी का प्राचीन कुंड जहां सदियों से आ रहा रहस्मयी जल बाराबंकी के डल्लूखेड़ा गांव स्थित सैलानी माता मंदिर के पास एक प्राचीन कुंड है, जहां से सैकड़ों वर्षों से लगातार जल निकल रहा है। इसका स्रोत अभी तक अज्ञात है। बाराबंकी जिला अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान के लिए जाना जाता है, लेकिन यहाँ सतरिख क्षेत्र के डल्लूखेड़ा गांव में एक ऐसा चमत्कारी कुंड है, जो आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। सैलानी माता मंदिर के पास स्थित इस प्राचीन कुंड की खासियत यह है कि इससे सैकड़ों वर्षों से लगातार जल निकल रहा है, जिसका स्रोत अभी तक किसी को नहीं पता है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह स्थान सैकड़ों साल पुराना है। ग्रामीणों के अनुसार, पहले यहाँ एक टीला हुआ करता था। एक बार जब कुछ चरवाहों ने इसकी सफाई की, तो अचानक यहाँ से जल की धारा बहने लगी, जो आज तक अनवरत जारी है। श्रद्धालु इस कुंड को बहुत पवित्र मानते हैं और उनका विश्वास है कि इस जल में स्नान करने से कई रोग दूर होते हैं। यही कारण है कि नवरात्र और कार्तिक पूर्णिमा के दौरान यहाँ एक बड़ा मेला लगता है, जिसमें दूर-दूर से लोग आकर स्नान...

राधाष्टमी 2025: कैसे करें पूजन.. आइये जानते हैं..।

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Radha Ashtami 2025 :करुणामयी श्रीराधा राधा अष्टमी पर कैसे करें पूजा, जानें सही विधि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व. श्री राधा किशोरी जू के प्राकट्य महोत्सव से पूर्व उनके स्वभाव का थोड़ा विचार कर लेते हैं। श्रीराधा रानी जी कृपा से परिपूर्ण हैं। करुणा तो किसी के भी हृदय में जागृत हो सकती है, लेकिन कृपा सब के बस की बात नहीं, वह तो हमारी किशोरी जू ही जानती हैं। करुणा और कृपा के मध्य एक सूक्ष्म भेद होता है। किसी गिरे हुए को देख कर मन में दया का भाव उत्पन्न होना, उसकी ऐसी दुर्दशा देख कर मन का व्यथित हो जाना, यह करुणा है। किसी गिरे हुए को हाथ पकड़ कर उठाना, उसकी यथासंभव सहायता करना और उसे अपने गंतव्य तक पहुँचा देना, यह कृपा है। भव सागर में पड़े इस जीव की दशा को देखकर कृपा सिंधु श्रीराधा रानी से रहा नहीं जाता और वह पात्र-कुपात्र के भेद को जाने बिना ही सब को पार लगा देती हैं। विषय-वासना में लिपटे जीव को श्रीकृष्ण तक पहुँचाने वाली सीढ़ी का नाम ही श्रीराधा है । राधा अष्टमी पर कैसे करें पूजा, जानें सही विधि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व श्री कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक 15 दिन बाद मनाया जाने वाला श्री राध...

गणेश महोत्सव / गणेश चतुर्थी पर्व... इतिहास एवं महत्व।

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गणेश चतुर्थी का पर्व भगवान गणेश को समर्पित है, जिन्हें बुद्धि और धन का देवता तथा विघ्नहर्ता माना जाता है। यह उत्सव भाद्रपद मास में दस दिनों तक चलता है और भगवान गणेश के जन्म का उत्सव माना जाता है। यह पर्व नए आरंभ, मानसिक स्पष्टता और आध्यात्मिक विकास का प्रतीक है। इसका ऐतिहासिक महत्व भी है। यह त्योहार महाराष्ट्र और गुजरात समेत देश के कई राज्यों और विदेश में उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है। खासकर, महाराष्ट्र में गणेश पूजा को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिलता है। हर घर में प्रतिमा स्थापित कर विधि विधान से गणपति बप्पा की पूजा की जाती है। धार्मिक मत है कि भगवान गणेश की पूजा करने से सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। साथ ही जीवन में व्याप्त सभी प्रकार के दुख और संकट दूर हो जाते हैं। सनातन धर्म में भगवान गणेश की पूजा सबसे पहले की जाती है। हालांकि, गणेश महोत्सव की तिथि को लेकर भक्तजन दुविधा में हैं। आइए, इसके बारे में सबकुछ जानते हैं- कब से शुरू होता है गणेश महोत्सव? हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से गणेश महोत्सव शुरू होता है। वहीं, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतु...