Posts

Showing posts with the label कविता

सतरंगी प्रीत

Image
प्रमुदित मन संचित करे,हरदम ही उल्लास। रंग सदैव उमंग का, जीवन में मधुमास।१। भाव भावना भेद को, नेक लगायें रंग। अमिट रहेगा उम्र भर, सहज नेह का ढंग।२। नयन झुकाये लाज से, अधर सजी मुस्कान। प्रिय के रंग में रंगी,सजनी एक सुजान।३। तन मन पर यूँ छा गया, रंग गुलाल अबीर। लोकलाज सब भूल कर, अंतस हुआ अधीर।४। रंग एक हो मीत का, सतरंगी हो प्रीत। विश्वास अटल प्रेम का, मन को लेता जीत।५। होली की शुभकामना, करिये मीत कबूल। ईर्ष्या द्वेष अतीत के, दर्द हृदय के भूल।६। बचें केमिकल रंग से, कर देते बीमार। प्राकृतिक रंग ही सदा,खुशियों का उपहार।७। निरुपमा मिश्रा 'नीरू'

औरत की आँखों से दुनिया

Image
औरत की आँखों से दुनिया यही तो गड़बड़ी है   कि औरतों की आँखों से दुनिया   नहीं देखी जाती   तभी तो करुणा-दया-ममत्व   रहित हुआ संसार   हिंसा, चोरी, डकैती, अनाचार   लूट- खसोट और मक्कारी ...

फिर मिलेंगे

Image
शून्य में निहारती शाम के धुंधलके में देखती रही मैं एकटक क्षितिज के पार जाते सूरज को.... एक दिन इसी पीताम्बरी छाया के तले कहीं दूर नील गगन की छांव में सपने बुनते-गुनगुनाते फिर मिलेंगे हम और तुम.... और हाँ, सुनूंगी मैं दिल से तुम्हारी वही बातें जिनको मैं सुना ही करती रही हूँ बार-बार.. हजारों बार क्योंकि जब मैं बोलने लगती हूँ तो तुम भी तो सुनते रहते हो मुझे प्यार -भरी आँखों से निहारते अपने होठों पर लिए मंद-मुस्कान ----- नीरु

नया सवेरा आयेगा

Image
पश्चिम में अरबों-खरबों रश्मियों वाला रथ जा पहुंचा है.... अगली सुबह का इंतजार करो सूरज डूबने को है सितारों-भरी रात आने को है.... आसमान में एक तारा और फिर प्रकट होंगे असंख्य तारे इ...

शातिर निगाहें

Image
                                                    सुबह के वक्त थोड़ी सुनसान सड़क                                                        पर फैली गंदगी के बीच                                                         सांवली-सलोनी काया                                                    अपनी उम्र के हिसाब से कुछ ज़्यादा                                          ...

तेरी वापसी

Image
                                            तेरी वापसी                                        जूही , चमेली,कचनार                                 चंपा,बेला और हरसिंगार के फूल                                         महक उठे फिर                                         दिवस मास नहीं                                  ऐसा लगा कि सदियों बाद                          ...

अर्धनारीश्वर

Image
सामर्थ्य सृजनशक्ति पुरुष और प्रकृति, आँखें देखती बाहर तो अकेलापन अधूरापन, अपने भीतर झांके पहचाने तो एकांत विवेक-बुद्धि सद्बुद्धि, मनन मन नमन, शक्ति का प्रयोजन अधूरा जब तक नही है शिवम्, सारतत्व यही जीवन का सत्यम, शिवम, सुन्दरम जगत-ईश्वर अर्धनारीश्वर वसुधैव कुटुम्बकम ----- नीरु ( निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी) 

नववर्ष

Image
कितनी सहजता से तारीखों के बदलते ही कैलेंडर बदल जाते , समय- परिस्थितियां भी बदल ही जाते, माटी के तन में एक मन जो इन सबके बीच समेटते- सहेजते बनते- बिगड़ते एक जैसा कहां रहता, बदला...

रंग दे बसंती चोला

Image
भर दे मन की पिचकारी भारत माँ दुलारी, तीन रंग में होती होली, विश्व गुरु बनकर लहराये तिरंगा - हिंदुस्तान देश के लिए तन मन धन सब हो जाये कुर्बान ----- निरुपमा मिश्रा

स्त्री - धर्म

Image
स्त्री जीवन को धारण पालन- पोषण करती, धर्म जीवन जीने की अनुशासित - प्रेरक जीवन शैली, स्वीकार होते दोनों आसानी से, तर्क- कुतर्क से परे जिन्हें अपनाया जाता रहा, फिर क्यों कुंठित होते अनियंत्रित जीवन को देखकर मन घबराता रहा, स्त्री धर्म तो हर कोई बताता रहा, पुरुष अपना धर्म निभाने से क्यों कतराता रहा, स्त्री अपनी कोख में जीवन को धारण करती, अपने जीवन में सबके वर्चस्व को स्वीकार करती , घर, परिवार, संसार के बीच अनगिनत जिम्मेदारियों को सरलता से अपनाती, फिर किस धर्म- अधर्म की परिभाषा में स्वयं स्त्री ही खुद को इंसान समझने- समझाने का धर्म भूल जाती, धर्म तो इंसानियत का ही दुनिया में है रह जाना, स्त्री - पुरुष सबको होगा साथ -साथ आगे आना कि बहुत जरूरी धर्म इंसानियत का निभाना ------ नीरु 'निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी'

संगिनी

कह दो तो दिन को भी मैं रात कह दूँ तपती हुई धूप को भी भीगी- भीगी सी बरसात कह दूँ, क्या मिलेगी इससे तुम्हें सम्पूर्ण खुशी कि कठपुतली - सी बनकर रहे तुम्हारी प्रेयसी, रूढ़ियों के पार तुम क्यों नही जाते, कारागार से निकल अपनी संपूर्णता क्यों नही अपनाते ? मेरा आँचल इतना छोटा तो नही कि माँ जैसी ममता बहन जैसा दुलार दोस्त के जैसा प्यार नही संभाल सके, तुम्हारे दामन में ढलकर भी अपना अस्तित्व नही संभाल सके, हमने संभाली हैं इसमें ही पीढ़ियाँ फिर क्यों इतना असमंजस में हो मुस्कराओ प्रिये कि तुम अपनी संगिनी के हृदय-मधुरस में हो -----  नीरु 

रूठ गये तो

Image
रूठ जायेगा रब तो भी वजह होगी कि बनाई दुनिया उसी ने संभालेगा वही सब, रूठ जायेगा ज़माना तो वजह होगी कि चाहिये दुनिया को अपने मतलब के लोग कभी तो कहीं तो जरूरत होगी ज़माने को भी मेरी, मगर मेरे अपने तुम हाँ तुम्ही रूठ गये तो जीने की वजह क्या होगी मालूम नहीं क्योंकि अपनों के संग होने की कोई वजह तो नही होती रिश्तों के बीच अपनेपन की चाह ये विश्वास की डोरी बाँधती हमें बेवजह भी लेकिन जब कभी तलाशते साथ होने की वजह तो अक्सर अपने- आप से रूठ जाते हम खुद-ब- खुद बेवजह -----नीरु ' निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी'

क्यों

Image
पत्थरों में ढाल दिया अस्तित्व और यूं ही जीवन बीत गया क्यों, सबके गीतों को तो बोल दिये अपने पर स्वयं के सुख-दुःख का खो संगीत गया क्यों, इंसान ही तो बेजान नही कोई स्पंदन तो कहीं बाकी फर्ज निभा कर भी मिले पराजय जग ये हरदम जीत गया क्यों,, ---- नीरु 'निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी' 

उम्र

Image
थामकर भरोसा नन्हे कोमल हाथों से वो इठलाता हुआ बचपन अनुभवी कंधों पर बैठकर देखता पूछ लेता बीच बीच में कैसी है दुनिया, बता देता यूं ही अनुभव कि तेरे-मेरे जैसी ये दुनिया और शब्दों के पीछे बिखरे पन्नों में समय की स्याही के रंग देखने लगता, कोमल रंगों को पक्का होने तलक कितने रंग देखने होंगे, बचपन से बुढ़ापे के बीच उम्र की नादानियां भूल जाती अपनी ताकत की दिशायें- सीमायें ख्वाबों-हकीकतों के साथ जब उम्र की आँखों पर चढ़ने लगते अनुभव के चश्में तब तस्वीरों के रंग समझ में आते, बचपन के सवाल सुनती युवा दिल की उलझनें देखती अपने भी कितने सवालों- उलझनों के हल खोजती वो अनुभवी उम्र ---- नीरु 'निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी'

आनलाइन फार्म

Image
लम्बी-लम्बी कतारों में मुरझा जाते चेहरे इंतजार करते-करते, आनलाइन दर्ज होनी थी बेरोजगारी की टीस, चालीस-छियालीस जगहों के लिए पाँच-छह लाख से ऊपर जाती संख्याओं में खुद को दर्ज कराते उंगलियां थरथराती, काफी जद्दोजहद के बाद जरूरतों को आनलाइन फार्म में दर्ज करने की खुशी आँखों में नये सपने सजाने को सजग हो जाती धीरे-धीरे, तारीखों के साथ बीतते समय में इंतजार करते -करते धुंधली चमक और फीके चेहरे  लिये फिर से लगती लम्बी कतार आनलाइन फार्म भरने के लिए \ ------ नीरु 'निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी'

सांकल ( दरवाजे की डोर)

Image
खोल दी मैंने अपने और कई घरों के दरवाजों की सांकल आहिस्ते से, ये सोचकर कि रोशनी का साथ होना भी जरूरी , बहुत अंधेरा होता है कितने चेहरे, कैसे चेहरे हैं कुछ पता नही चलता, ऐसे में घर की चौखट से निकलो तो रास्तों पर भी अंधेरा ही मिलता है  , मिल जाते वहाँ अनगिनत पैर नही दिखते जिनके चेहरे मगर, कुछ पैर चलते - भागते कुछ डगमगाते हुए लगते जो कि आते हुए अपनी ओर ही, ऐसा एहसास होता अचानक कि कई विषधर चले आ रहे हों उन पैरों  की जगह, कई दूसरे पैर उन पैरों को देख परवाह नही करते और बेफिक्र अपनी राह चलते, कई और तो चुपके से अपने को महफूज रखने को दिशायें तलाशते, लेकिन कोई मेरे डरे, सहमें हुए पैरों के साथ नही चलता, ये पैर किसके हैं नही पहचाने जाते उनके चेहरे भी क्योंकि घर से ही शायद अंधेरा मेरे साथ चल रहा होता, तभी तो आज मैंने घर से निकलने के साथ खुद ही खोल दी है अपने और अपने रास्तों में मिलते घरों के बंद दरवाजों की सांकल कि रोशनी लेकर साथ चलूं और लौटकर आ सकूं अपने घर को शायद मैं , सुरक्षित ----- निरुपमा मि...

परिवर्तन

Image
जानती हूँ जीवन में आगे जाने के लिए अपनी मजबूत जगह बनाने के लिए अपने को बहुत बदलना पड़ता है, पर इस बदलने की कोशिश में कहीं हम खुद को ही न  कहीं भूल जायें, अपने चेहरे पर किसी और का मुखौटा न लगायें, जरूरी है कुछ पाने के लिए कुछ खोना, लेकिन जरूरी तो नही ऐश्वर्य पाने के लिए ईश्वर को खोना,,,, ----- नीरु 'निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी'

मैं हूँ मुझमें

Image
मैं कभी अपने से अलग तो नही, डरती अपने को खोने से कहीं, जीवन की चौखट पर रहे सुख-दुःख मेहमान सदा, सीखी है मैंने जिंदगी हँसकर जीने की अदा, आँखों में मेरे संजोती  आशायें रोशनी दर्द में भी होंठों पर हँसी, बिखराव में सबको समेटते अगर कभी मैं  अंधेरों में भटकती  तो मेरी आस्थायें मुझे खुद से मिलातीं मेरे संस्कार जीवंत रखते  मेरे जीवन- अस्तित्व को, बहुत अच्छा  कि मैं कहीं खोई नहीं, मिल ही जाती  आसानी से मैं हूँ शाश्वत मुझमें ------- नीरु 'निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी'

अज्ञानी

Image
चलो, उठाओ किताबी बातें कहीं और लेकर जाओ, यहाँ हर शब्द धुंधले नज़र आते हैं जब अनुभव से परे बातें बताते हैं, खुल जाये मन की आँखें तो खोल लो, अपनी भावनायें भी तो तौल लो, अपने फर्ज़ से मुँह छिपाना, परछाई-मृगतृष्णा के पीछे भागना क्या ज्ञान कहलाता, रहने दो फिर तो मुझे अज्ञानी बने रहना भाता ,,,, ----- नीरु 'निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी'

जीवन की गाड़ी

Image
एक की अपूर्णता पूर्ण हो जाती दूसरे का सामर्थ्य पाकर हाथ में हाथ थामें कदम मिलाते कदमों से, सुनते हैं एक- दूजे के सुख-दुःख छिपे उनकी धड़कनों में, जीवन की गाड़ी के दो पहिये बराबर सहयोग करते, तमाम झंझावात- खुशियां समेटते, एक राह के हमसफर जीवन भर का साथ जीवनसाथी अगर विपरीत रूप लेकर अलग - अलग दिशाओं के रुख किये चलते रहें तो जीवन नरक से बदतर हो जाता ,फिर तो साथ - साथ चलना सम्मान संजोये रखने की मजबूरी कहलाता ----- नीरु ' निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी'