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समाज की आत्मा- शिक्षा

शिक्षा हमारे समाज की आत्मा है जो कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दी जाती है अतः शिक्षा का  एक उद्देश्य एक खाली दिमाग को एक खुले दिमाग में बदलना होता है|    हमारे भारत देश में शिक्ष...

फिर मिलेंगे

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शून्य में निहारती शाम के धुंधलके में देखती रही मैं एकटक क्षितिज के पार जाते सूरज को.... एक दिन इसी पीताम्बरी छाया के तले कहीं दूर नील गगन की छांव में सपने बुनते-गुनगुनाते फिर मिलेंगे हम और तुम.... और हाँ, सुनूंगी मैं दिल से तुम्हारी वही बातें जिनको मैं सुना ही करती रही हूँ बार-बार.. हजारों बार क्योंकि जब मैं बोलने लगती हूँ तो तुम भी तो सुनते रहते हो मुझे प्यार -भरी आँखों से निहारते अपने होठों पर लिए मंद-मुस्कान ----- नीरु

नया सवेरा आयेगा

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पश्चिम में अरबों-खरबों रश्मियों वाला रथ जा पहुंचा है.... अगली सुबह का इंतजार करो सूरज डूबने को है सितारों-भरी रात आने को है.... आसमान में एक तारा और फिर प्रकट होंगे असंख्य तारे इ...

बाल-अपराध , कारण एवं निवारण

बच्चे अपने माता-पिता के लिए उनकी उम्मीद के साथ ही उनके माता-पिता के ही समान होते हैं अतः माता-पिता के समान ही ये बच्चों की भी जिम्मेदारी होती है कि वो अपने भविष्य के निर्माण क...

शान अपनी सभी तो दिखाते रहे

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                 शान अपनी सभी तो दिखाते रहे                  दर्द भी क्या कहें गुनगुनाते रहे                  आपके प्यार में हम बेहया हो गये                  प्यार भी क्या ज़हर सब पिलाते रहे                  आपने दे दिया ग़म यही है बहुत                  और क्या दे सके मुस्कराते रहे बात कुछ भी नहीं और बातें बहुत आप भी तो कहानी सुनाते रहे हम रहे राह में चल दिये दो कदम आप मंजिल बहुत पास आते रहे --- नीरु ( निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी)

अब मिले आप

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अब मिले आप भी, ज़िंदगी की तरह रोशनी मिल गयी, बंदगी की तरह हम नहीं बेख़बर, आपसे अब रहे आप हैं अब हमारी,ख़ुशी की तरह ---- नीरु

आसमां वही फिर उठाकर चले

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                    बात कोई जो दिल में छुपाकर  चले ।                     आसमां भी वही फिर उठाकर चले ।                      राह में ठोकरें भी बहुत- सी लगी,                      हौसले हम सभी फिर जगाकर चले।                      देखिये तो सनम इक इधर भी नज़र,                      हाथ भी तो हमीं से मिलाकर चले । आप भी साथ में अब हमारे हुए, ख़्वाब अपने सभी हम सजाकर चले । कौन दुश्मन हमारा यहाँ पर हुआ भेद अपने सभी हम भुलाकर चले ---- नीरु ( निरुपमा मिश्रा)