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मन की पीड़ा झुठलाई

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 दिवंगत पूज्यनीय पिता जी को अश्रुपूरित श्रृद्धांजलि....🙏 मोहक सरल छवि आपकी सागर सी गहराई। व्यक्तित्व गगन के जैसा धरती सम करुणा पाई। साहस का पर्याय आप थे संघर्षों से भरा था जीवन, ममता की मूरत थे हरदम निर्मल निश्छल था अंतर्मन, मधुर बोल की औषधि से मन की पीड़ा झुठलाई। पथ प्रदर्शक आशा ज्योति जीवन भर ही कर्म रहा, सुख दुख में समदर्शी थे परोपकारी मर्म रहा, जीवन अनमोल धरोहर बात हमेशा सिखलाई। सखा पिता बेटा भाई पति रूप अनूप आपके, सदगुणों के महासागर उत्तम इंसान आप थे, धन्य भाग्य मेरे मै जो सुता आपकी कहलाई। निरुपमा मिश्रा 'नीरू''

सतरंगी प्रीत

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प्रमुदित मन संचित करे,हरदम ही उल्लास। रंग सदैव उमंग का, जीवन में मधुमास।१। भाव भावना भेद को, नेक लगायें रंग। अमिट रहेगा उम्र भर, सहज नेह का ढंग।२। नयन झुकाये लाज से, अधर सजी मुस्कान। प्रिय के रंग में रंगी,सजनी एक सुजान।३। तन मन पर यूँ छा गया, रंग गुलाल अबीर। लोकलाज सब भूल कर, अंतस हुआ अधीर।४। रंग एक हो मीत का, सतरंगी हो प्रीत। विश्वास अटल प्रेम का, मन को लेता जीत।५। होली की शुभकामना, करिये मीत कबूल। ईर्ष्या द्वेष अतीत के, दर्द हृदय के भूल।६। बचें केमिकल रंग से, कर देते बीमार। प्राकृतिक रंग ही सदा,खुशियों का उपहार।७। निरुपमा मिश्रा 'नीरू'

पलायन

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मीलों तक पैदल चले, सभी उपेक्षित लोग| प्रकोप को भी रोकना,बड़ा भयानक रोग|| मजदूरी मिलती नही,मिला नही है काम| पापी पेट न मानता,कैसे हो आराम|| निरुपमा मिश्रा नीरू

धरती का उल्लास

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बंद क्यों भ्रमर राग है,सारिका भी उदास| कहो तो कब कहाँ गया,धरती का उल्लास| सुखद पल नवल भोर का,विश्वास अटल रहे, धीरज संयम नियम का ,करना बस अभ्यास| निरुपमा मिश्रा 'नीरू' आप सभी को नव संवत्सर एवं चैत्र नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें....

कोरोना का कहर

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दोहे- कोरोना का कहर कोरोना के खौफ से, सहमा हुआ समाज | वैज्ञानिक हर देश के, खोजें अभी इलाज|| ज्वर,खाँसी, सिरदर्द भी,लगे कष्टमय साँस| अविलंब जाँच के लिए, रहें चिकित्सक पास|| बीमारी के नाम से , मत रहिये भयभीत| भेद तीन पहचानिये,ज्वर,खाँसी अरु शीत|| रखें संक्रमित व्यक्ति से, खुद को निश्चित दूर| अपने मुख अरु नासिका, ढकिये आप जरूर|| अभी रोग उपचार का, नही सटीक साधन| सही नियम ,आचार का, करें पूरा पालन|| करबद्ध अभिवादन से,संयमित हो मिलाप| व्यक्तिगत संबंधों में, सतर्क रहिये आप|| संक्रमण के प्रसार से,करिये सभी बचाव| साफ रखिये हाथ सदा, अपनाइये सुझाव|| जनसमूह ज्यादा जहाँ, रहें वहाँ से दूर| व्यर्थ भ्रमण करिये नही, रखिये ध्यान जरूर|| निरुपमा मिश्रा 'नीरू'

औरत की आँखों से दुनिया

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औरत की आँखों से दुनिया यही तो गड़बड़ी है   कि औरतों की आँखों से दुनिया   नहीं देखी जाती   तभी तो करुणा-दया-ममत्व   रहित हुआ संसार   हिंसा, चोरी, डकैती, अनाचार   लूट- खसोट और मक्कारी ...

समाज की आत्मा- शिक्षा

शिक्षा हमारे समाज की आत्मा है जो कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दी जाती है अतः शिक्षा का  एक उद्देश्य एक खाली दिमाग को एक खुले दिमाग में बदलना होता है|    हमारे भारत देश में शिक्ष...