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सांकल ( दरवाजे की डोर)

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खोल दी मैंने अपने और कई घरों के दरवाजों की सांकल आहिस्ते से, ये सोचकर कि रोशनी का साथ होना भी जरूरी , बहुत अंधेरा होता है कितने चेहरे, कैसे चेहरे हैं कुछ पता नही चलता, ऐसे में घर की चौखट से निकलो तो रास्तों पर भी अंधेरा ही मिलता है  , मिल जाते वहाँ अनगिनत पैर नही दिखते जिनके चेहरे मगर, कुछ पैर चलते - भागते कुछ डगमगाते हुए लगते जो कि आते हुए अपनी ओर ही, ऐसा एहसास होता अचानक कि कई विषधर चले आ रहे हों उन पैरों  की जगह, कई दूसरे पैर उन पैरों को देख परवाह नही करते और बेफिक्र अपनी राह चलते, कई और तो चुपके से अपने को महफूज रखने को दिशायें तलाशते, लेकिन कोई मेरे डरे, सहमें हुए पैरों के साथ नही चलता, ये पैर किसके हैं नही पहचाने जाते उनके चेहरे भी क्योंकि घर से ही शायद अंधेरा मेरे साथ चल रहा होता, तभी तो आज मैंने घर से निकलने के साथ खुद ही खोल दी है अपने और अपने रास्तों में मिलते घरों के बंद दरवाजों की सांकल कि रोशनी लेकर साथ चलूं और लौटकर आ सकूं अपने घर को शायद मैं , सुरक्षित ----- निरुपमा मि...

चेहरे

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नकाबों में छुपे हैं चेहरे कितने झूठे थे ख्वाब जो, वो सुनहरे कितने निगाहें भी निगेहबां भी हमारे वो दिखाये अक्स जो, वो दोहरे कितने ----  नीरु ( निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी)

सच-झूठ

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जिंदगी के अनेक रूप होते हैं,कभी छाँव तो कभी धूप,ऐसे ही कभी बदलते मौसम जैसे रंग बदलते हैं रिश्ते भी, फिर भी मन की डोर से बंधे रिश्ते कभी मन से दूर नही होते|       वसुधा की माँ के अस...

देश

देश के लिए भी तो मशविरा करिये कुर्बान अपनी जिस्म-ओ-जां करिये अंधेरा न हो रास्तों पर कभी भी हो सके तो चिराग़ -सा जला करिये ---- निरुपमा मिश्रा " नीरू"

परिवर्तन

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जानती हूँ जीवन में आगे जाने के लिए अपनी मजबूत जगह बनाने के लिए अपने को बहुत बदलना पड़ता है, पर इस बदलने की कोशिश में कहीं हम खुद को ही न  कहीं भूल जायें, अपने चेहरे पर किसी और का मुखौटा न लगायें, जरूरी है कुछ पाने के लिए कुछ खोना, लेकिन जरूरी तो नही ऐश्वर्य पाने के लिए ईश्वर को खोना,,,, ----- नीरु 'निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी'

मित्रता

प्यार,स्नेह,ममता का भला कोई क्या मोल दूँ मैं शब्दों से ऊपर जो, उसे कोई क्या बोल दूँ मैं रिश्तों में दोस्ती है तो कायम दोस्ती से रिश्ते साँसें हैं जिनसे,नाम कोई क्या अनमोल दूँ ...

कृतज्ञ राष्ट्र की भावभीनी श्रृद्धांजलि,, सलाम हमारा आदरणीय कलाम जी को

गर्व उन्नत भाल के थे सम्मान, विजय-तिलक सरीखे राष्ट्र-नयनों ने उनके संग निज स्वप्न हैं सफल देखे शिक्षक थे हिंदुस्तानी, तो शिक्षक समान ही विदा हुए ज्ञान,विज्ञान,स्वाभिमान का आजीवन संगम अनूठे ------ नीरु