शिव रात्रि पर्व पर विशेष...शिव-शक्ति से सीखिए बच्चों की परवरिश का सही तरीका।
अपने बच्चों की सफल परवरिश के सूत्र सीखिए भगवान शिव और माँ पार्वती से, बच्चों के लिए अपनाएं ये चार नियम...आज महा शिवरात्रि पर विशेष।
बच्चों के अच्छे और उज्जवल भविष्य के लिए सही परवरिश बेहद जरूरी है। खासकर आज के दौर में बच्चों की सही परवरिश एक मजबूत भविष्य में अहम भूमिका निभाती है।
हमें देवी-देवताओं और हमारे भगवान - भगवती से भी पेरेंटिंग से जुड़ी जरूरी बातें सीखने को मिलती हैं। भगवान शिव और माता पार्वती इन्हीं में से एक हैं, जो एक आदर्श माता-पिता के उदाहरण हैं।
आज शिवरात्रि के मौके पर हम जानेंगे कैसे शिव-शक्ति सिखाते हैं पेरेंटिंग का सटीक तरीका-
हर बच्चे की अपनी खासियत होती है
शिव और पार्वती के पुत्र भगवान गणेश और कार्तिकेय, दोनों एक ही माता-पिता की संतान हैं, लेकिन दोनों का स्वभाव बिल्कुल अलग है। जहां गणेश जी धैर्यवान और बुद्धिमान हैं, तो वहीं कार्तिकेय जी ऊर्जावान और प्रतिस्पर्धी हैं। फिर भी शिव-पार्वती ने कभी अपने बच्चों की तुलना नहीं की। इसी तरह हमें भी माता-पिता के रूप में अपने बच्चों की तुलना बंद करके उनकी अपनी खूबियों को निखारना चाहिए।
माता-पिता की आपसी समझ और एकता
यह तो सभी जानते हैं कि शिव और पार्वती स्वभाव एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं। शिव वैरागी और शांत हैं, जबकि माता पार्वती गृहस्थ और ममतामयी हैं। बावजूद इसके दोनों एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। गणेश जी के जन्म और सिर कटने की घटना के दौरान दोनों में मतभेद हुए, लेकिन अंत में उन्होंने मिलकर परिवार को एक कर लिया। इससे यह सीख मिलती है कि भले ही माता-पिता की राय अलग हो, लेकिन बच्चों को सामने दोनों को मिलकर एक टीम की तरह रहना चाहिए।
डर से नहीं, प्यार से सिखाएं
भगवान शिव जितने भोले हैं, उतना ही तेज उनका गुस्सा होता है। भोलेनाथ के क्रोध का ही नतीजा है कि गणेश जी का सिर कटने की घटना हुई, लेकिन इसके बाद गणेश जी पहले से अधिक बुद्धिमान और पूजनीय बनकर उभरे। इसी तरह पेरेंट्स को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि गुस्से का क्या नतीजा होगा। बच्चों को डराने के बजाय उन्हें यह समझाना चाहिए कि उनके कार्यों के परिणाम क्या होंगे।
बच्चों को फ्रीडम दें
शिव जी योगी होकर भी एक जिम्मेदार पिता हैं। माता पार्वती रक्षा करने वाली हैं, लेकिन उन्होंने भी अपने बच्चों को उनके रास्ते खुद चुनने दिए। एक ओर जहां कार्तिकेय घर छोड़कर अपना उद्देश्य पूरा करने गए, तो वहीं गणेश जी ने कम उम्र में ही जिम्मेदारियां संभालीं। इससे यह सीख मिलती है कि आज के दौर में बच्चे को गिरने से बचाना जरूरी है, लेकिन उन्हें स्वतंत्र बनाना भी जरूरी है।
साभार- गूगल/ दैनिक जागरण
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