Tuesday, 20 September 2016

सुखद भविष्य का अनुष्ठान ( पितृपक्ष)

अध्यात्म की भाषा में यदि कहा जाये तो मृत्यु के पश्चात् वीतरागी आत्मा संसार से मुक्त होकर ईश्वरीय शक्ति के स्वरुप में समाहित हो जाती है किन्तु राग-विराग , मोह-माया , दु:ख -सुख, वैमनस्य  आदि अनेक प्रकार की  इच्छाओं- आकांक्षाओं के वशीभूत होकर पुनर्जन्म के माध्यम से अपनी काम्य वस्तुओं एवं प्रिय लोगों के चतुर्दिक् अपने नवजीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियों की तलाश करती है |
     यह प्रश्न सदैव शाश्वत रहा है कि क्या पितृपक्ष में हमारे पूर्वजों को जो कि भौतिक शरीर को त्याग चुके हैं , उन्हें सम्पत्ति , भोजन, कपड़ों आदि की आवश्यकता होती होगी, यदि मृत देह से विमुक्त स्वतंत्र विचरित आत्मा को समय और स्थान से परे कहीं दूर किसी नवीन आयाम में रहना सुनिश्चित है तो वंशजों द्वारा श्रृद्धापूर्वक भावअर्पण के विभिन्न उपादानों एवं क्रियाकलापों से प्रसन्नता तो जरुर मिलती होगी|
      पितृ-ऋण से मुक्ति के विधान के लिए विवाह-संस्कार की रीति निर्धारित की गई है , यहां पर गौरतलब है कि विवाह की रीति निभाने के लिए पहले पांच तत्वों से निर्मित भौतिक शरीर में उपस्थित प्राणस्वरुप आत्मा को पांच तत्वों से बने इस ब्रह्माण्ड में व्याप्त जीवन के लिए आवश्यक पांच तत्वों अर्थात् मिट्टी , पानी,आग, आकाश, और हवा में समाहित प्राणशक्तियों  का आह्वान करके परम सत्ता परमात्मा के रुप में मिलन या स्थापित कराया जाता है फिर दो स्थूल शरीरों का मिलन पूर्वजों के उद्धार के लिए संतानोपत्ति आदि के नियमों के लिए किये जाने का विधान है | पति अर्थात् सम्मान और पत्नी उस सम्मान को बनाये रखने वाली शक्ति तो संतान का अर्थ है सम- सम्यक एवं तान- विस्तार अतः पितृऋण का वास्तविकअर्थ तो यही है कि परिवार -भाव के प्रति दायित्व का बोध |
       कोई भी जीव या मानव स्वयं में सम्पूर्ण नहीं हो सकता है , वह परिवार से ही संयुक्त इकाई बनता है तो परिवार से ही ये संसार भी बना है इसीलिए ये संसार भी एक परिवार जैसा होता है, हमारे हाथों की जब पांचों उंगलियां ही बराबर नही होती तो संसार में विवेकवान जीव की श्रेणी में माने जाने वाले मानव जाति के स्वभाव में समानता अकल्पनीय है, जिसकी जैसी समझ उसका वैसा विचार , जिसके जैसे विचार उसका वैसा ही कर्म और व्यवहार होता है |
     हिंन्दू धर्म में परिवार को समाज की सबसे छोटी इकाई के रुप माना जाता है अतः हर व्यक्ति किसी न किसी पारिवारिक रिश्ते की डोर से जुड़कर सामाजिक इकाई के पूरक के रुप में मैत्री भाव की स्थापना करता है , यही भावना विस्तृत रुप में भातृत्व भाव की परम्परा को स्थापित करती है जिसमें व्यक्ति पूरे विश्व को ही अपना परिवार मानने लगता है , उसके लिए कोई अपना-पराया नही रह जाता है , वह हर चर-अचर जीव जगत को गुरु मानता है |
     धर्म तो धारण करने की रीति जैसा ही है , धार्मिक भावनायें केवल भविष्य की सुखद आशायें उपजाती हैं जिनमें बीते हुये सुख-दुःख आदि के स्मरण का विधान नही बल्कि स्थूल शरीर को अग्नि या किसी जलप्रवाह को अर्पित करके भाव- शरीर को स्मरण करके सच्ची श्रृद्धांजलि देने के धार्मिक विधान सुनिश्चित किये गये हैं और सुखद उज्जवल भविष्य की नींव संजोई गई है| पितृऋण के संदर्भ में एक मंत्र उल्लिखित है कि -----
     ऊँ गोत्रन्नों वर्द्धतां दातारो नोSभिवर्द्धन्तां वेदाः सन्ततिरेव च|
     श्रद्धा च नो मा व्यवगमद् बहुदेयं च नोस्तु |
     अन्नं च नो बहु भवेदतियींश्च लभेमहि |
     याचिताश्च न: सन्तुमा च यानिष्म कंचन |
     एता: सत्या: आशिष: सन्तु |
अर्थात् हमारा गोत्र बढ़े,हमें देने वाले देवता बढ़ें , वेद-रुप ज्ञान की वृद्धि हो | श्रृद्धा मुझसे कभी अलग न हो , सदा अतिथि के सत्कार का लाभ पायें, हमसे लोग मांगने वाले हों,हमें किसी से मांगना न पड़े, ये मंगलकामनायें पूरी हों |
      पूजन विधियों में सदैव गोत्र का नाम स्मरण किया जाता है जो कि रक्त संबंध के परिचय के लिए आवश्यक माना जाता है जिसमें पूर्वजों की परम्परा, शौर्य, सद्गुण, सद्भावनायें आदि सम्मिलित होती हैं अतः पूर्वजों के रक्त के परिचायक बने रहने हेतु वंशजों को अपने भाव कर्मों आदि का उचित एवं सबके हित को ध्यान में रखते हुए पालन करना होता है, लेकिन जिस प्रकार ईश्वर को भी किसी ने नही देखा बल्कि ईश्वरीय शक्तियों को किसी न किसी मानवरुप में ही देखा , समझा और पूजा जाता रहा है वो केवल भावनाओं, कर्मों, बुद्धि , समझ, विचार और व्यवहार पर ही निर्भर होता है कि जिस भी मनुष्य या किसी जीव ने जगत कल्याण के लिए सद्भावनाओं की रक्षा अपने प्राणप्रण से की है वह किसी भी रुप-रंग , जाति -धर्म, लिंग, आदि में जन्मा हो वह देवस्वरुप साक्षात गुरु के रुप में परखा जाता  और अनुकरणीय हो जाता है |
     इसप्रकार किसी भी धर्म के विभिन्न उपादानों , मान्यताओं में मात्र सुखद भविष्य की कल्पना एवं कामना ही होती जो कि व्यक्ति में उसकी सामर्थ्य , बुद्धि, विचार , भावना, व्यवहार और कर्मों से विस्तार करके लोककल्याण में पूर्णत: समर्पित हो जाती है इसके लिए गृहस्थ आश्रम का त्याग जरुरी तो नही मगर सर्वसहमति भी आवश्यक समझी जाती रही है किन्तु वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा भी कोरी कल्पना नही है बल्कि अपरिहार्य एवं सर्वसाध्य होती है |
------- नीरु ' निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी '

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